नई दिल्ली: बच्चे के जन्म के बाद नई मां के लिए नींद पूरी न होना, रात में बार-बार उठना और स्तनपान कराना सामान्य दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। इस दौरान सुबह आंखों या पलकों के आसपास हल्का फूलापन नजर आना कई बार अस्थायी हो सकता है। लेकिन अगर डिलीवरी के कई सप्ताह या महीनों बाद भी आंखों के आसपास सूजन लगातार बनी रहे, तो इसे केवल थकान या नींद की कमी से जोड़कर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक रहने वाली सूजन के पीछे शरीर में पानी और नमक का असंतुलन, थायरॉइड, किडनी, ब्लड प्रेशर या अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारण हो सकते हैं। ऐसे में लगातार लक्षण रहने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
स्तनपान के दौरान क्यों हो सकती है हल्की सूजन?
स्तनपान कराने वाली महिलाओं के शरीर को पर्याप्त ऊर्जा और तरल पदार्थों की जरूरत होती है। यदि पानी कम पिया जाए, आराम पर्याप्त न मिले या भोजन संतुलित न हो, तो कुछ महिलाओं में चेहरे और पलकों के आसपास अस्थायी सूजन दिखाई दे सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार कई सप्ताह या महीनों तक बनी रहने वाली सूजन को केवल स्तनपान से जोड़ना सही नहीं है। अगर समस्या लगातार बनी रहती है या धीरे-धीरे बढ़ रही है, तो इसके पीछे किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या की जांच जरूरी हो सकती है।
आंखों के आसपास सूजन सबसे पहले क्यों दिखती है?
आंखों के आसपास की त्वचा शरीर के कई अन्य हिस्सों की तुलना में पतली होती है। इसलिए शरीर में अतिरिक्त तरल जमा होने पर उसका असर इस हिस्से में जल्दी दिखाई दे सकता है।
किडनी अगर शरीर से अतिरिक्त पानी और सोडियम को ठीक तरह से बाहर न निकाल पाए, तो सुबह के समय पलकों में ज्यादा सूजन दिखाई दे सकती है। इसी तरह कुछ महिलाओं में प्रसव के बाद थायरॉइड से जुड़ी समस्या चेहरे और आंखों के आसपास लगातार सूजन का कारण बन सकती है।
ब्लड प्रेशर से संबंधित समस्याओं में भी अन्य लक्षणों के साथ शरीर में सूजन दिखाई दे सकती है।
सिर्फ नींद की कमी ही नहीं है वजह
आंखों के आसपास फूलापन कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है। इनमें कम पानी पीना, अधिक नमक का सेवन, एलर्जी, कुछ दवाओं का प्रभाव और पोषण से जुड़ी कमियां शामिल हो सकती हैं।
नई मां के लिए पर्याप्त भोजन और तरल पदार्थ लेना खास तौर पर महत्वपूर्ण है। हालांकि, लगातार बनी रहने वाली सूजन को केवल खान-पान या स्तनपान की वजह मानकर लंबे समय तक टालना उचित नहीं है।
इन लक्षणों के साथ सूजन हो तो तुरंत लें चिकित्सकीय सलाह
यदि आंखों के आसपास सूजन लंबे समय से बनी हुई है और इसके साथ दूसरे लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। खास तौर पर निम्न संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है:
- पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में भी सूजन
- अचानक या तेजी से वजन बढ़ना
- पेशाब की मात्रा या सामान्य पैटर्न में बदलाव
- सांस लेने में परेशानी
- असामान्य या लगातार थकान
- धुंधला दिखाई देना
- तेज या लगातार सिरदर्द
इनमें से किसी लक्षण का होना किसी गंभीर बीमारी की निश्चित पुष्टि नहीं करता, लेकिन चिकित्सकीय जांच की जरूरत जरूर हो सकती है।
डॉक्टर किन जांचों की सलाह दे सकते हैं?
लगातार सूजन का कारण जानने के लिए डॉक्टर पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच करते हैं। लक्षणों के आधार पर ब्लड प्रेशर की निगरानी, यूरिन टेस्ट और किडनी फंक्शन की जांच की जा सकती है।
कुछ मामलों में थायरॉइड, लिवर और ब्लड प्रोटीन से जुड़े टेस्ट भी कराए जा सकते हैं। यदि हृदय संबंधी समस्या का संदेह हो, तो डॉक्टर ECG या इकोकार्डियोग्राफी जैसी जांच की सलाह दे सकते हैं। एलर्जी की संभावना होने पर उसके अनुरूप परीक्षण किया जा सकता है।
इलाज पूरी तरह कारण पर निर्भर
आंखों के आसपास सूजन का कोई एक सामान्य इलाज नहीं है। उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि सूजन की वास्तविक वजह क्या है।
यदि समस्या कम आराम, असंतुलित खान-पान या हल्के फ्लूड रिटेंशन से जुड़ी है, तो पर्याप्त आराम, संतुलित भोजन, उचित मात्रा में पानी और अन्य तरल पदार्थ तथा नमक का संतुलित सेवन मददगार हो सकता है। कुछ मामलों में आंखों पर थोड़ी देर ठंडी सिकाई से भी अस्थायी राहत मिल सकती है।
लेकिन यदि जांच में थायरॉइड, किडनी, ब्लड प्रेशर या किसी अन्य बीमारी की पुष्टि होती है, तो डॉक्टर उसी बीमारी के अनुसार उपचार तय करेंगे। बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई दवा शुरू करना उचित नहीं है।
डिलीवरी के बाद हर बदलाव को सामान्य न मानें
प्रसव के बाद शरीर में कई तरह के हार्मोनल और शारीरिक बदलाव होते हैं। इसलिए कुछ अस्थायी समस्याएं सामान्य हो सकती हैं। लेकिन जो लक्षण लगातार बने रहें, बार-बार लौटें या दूसरे शारीरिक संकेतों के साथ दिखाई दें, उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
नई मां के लिए अपनी सेहत पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है जितना बच्चे की देखभाल करना। आंखों के आसपास लगातार सूजन दिखाई दे रही हो तो समय पर डॉक्टर से जांच कराने से इसके वास्तविक कारण का पता लगाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर उचित उपचार शुरू किया जा सकता है।
