नई दिल्ली: देश की प्रमुख फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) और कंज्यूमर स्टेपल्स कंपनियों के लिए आने वाले दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं. यस सिक्योरिटीज की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में कच्चे माल के महंगाई सूचकांक में सालाना आधार (YoY) पर 13.2 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इससे पहले अप्रैल में भी यह 9.7 प्रतिशत बढ़ा था. महीने-दर-महीने (MoM) के आधार पर देखें तो अप्रैल में 6.3 प्रतिशत की बड़ी तेजी के बाद मई में यह सूचकांक 2.3 प्रतिशत और चढ़ गया.
- मई 2026 तक के थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आंकड़ों पर आधारित यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि रोजमर्रा के इस्तेमाल का सामान बनाने वाली कंपनियों के लिए इनपुट कॉस्ट का दबाव तेजी से बढ़ रहा है. इस महंगाई की मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और खाद्य तेलों की आसमान छूती कीमतें हैं, जिसे कमजोर भारतीय रुपये ने और ज्यादा गंभीर बना दिया है.
- क्रूड ऑयल का झटका: ब्रेंट क्रूड इंडेक्स में सालाना आधार पर 58.0 प्रतिशत और तिमाही आधार पर 32.3 प्रतिशत की भारी तेजी आई है. मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से सप्लाई रुकने की आशंका के कारण कच्चे तेल में यह उछाल आया. हालांकि, जून में युद्धविराम के बाद इसमें कुछ सुधार हुआ, लेकिन एल्किल बेंजीन जैसी पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी सामग्री 12.4 प्रतिशत महंगी हो चुकी है.
- खाद्य तेलों में उछाल: पाम ऑयल की कीमतें सालाना आधार पर 11.1 प्रतिशत बढ़ी हैं. इंडोनेशिया द्वारा जुलाई 2026 से लागू किए जा रहे ‘B50 बायोडीजल कार्यक्रम’ के कारण पाम ऑयल की मांग और कीमतें मजबूत बनी हुई हैं. इसके अलावा, मुंबई में रिफाइंड सोयाबीन तेल की कीमत में भी 20.7 प्रतिशत की भारी सालाना वृद्धि देखी गई है.
- चाय और दूध महंगे, कोको और कोपरा में राहत
एग्रीकल्चर इनपुट में मिला-जुला रुख देखने को मिला है. मौसम की मार और खराब सप्लाई के कारण चायपत्ती की थोक कीमतें 3.8 प्रतिशत बढ़ गई हैं, जबकि दूध की कीमतों में 2.5 प्रतिशत की मामूली तेजी आई है. राहत की बात यह है कि बेहतर सप्लाई के कारण कोपरा की कीमतें 25.8 प्रतिशत टूट गई हैं और कोको की कीमतों में 54.9 प्रतिशत की बड़ी गिरावट आई है, जिससे चॉकलेट और कंफेक्शनरी कंपनियों को थोड़ी राहत मिलेगी.
कमजोर रुपये की ‘दोहरी मार’
घरेलू कंपनियों के लिए इस कमोडिटी संकट को डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपये ने और ज्यादा बढ़ा दिया है. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया सालाना आधार पर 10.7 प्रतिशत कमजोर होकर ₹95 के स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है. रिपोर्ट के अनुसार, रुपये में इस कमजोरी का मतलब है कि पाम ऑयल, क्रूड डेरिवेटिव और स्पेशलिटी केमिकल्स जैसे तमाम आयातित कच्चे माल पर भारतीय कंपनियों को ‘दोहरी मार’ पड़ रही है—एक तरफ वैश्विक बाजार में बढ़ी कीमतें और दूसरी तरफ डॉलर के मुकाबले ज्यादा चुकाने वाली रकम.
इस बढ़ती लागत के कारण FMCG कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ रहा है, जिससे आने वाले हफ्तों में साबुन, तेल, शैम्पू और अन्य घरेलू सामानों की कीमतों में बढ़ोतरी या उनके वजन में कटौती की पूरी संभावना बन गई है.


