कंपनियों की पुनर्खरीद पेशकश में शेयर बेचकर व्यक्तिगत या कॉरपोरेट शेयरधारकों द्वारा अर्जित पूंजीगत लाभ पर एक अप्रैल से 12 प्रतिशत का एकसमान अधिभार लगाया जाएगा. लोकसभा से बुधवार को वित्त विधेयक को मिली मंजूरी में यह संशोधन किया गया है.
सरकार ने बुधवार को वित्त विधेयक 2026 में 32 संशोधन पेश किए. वित्त विधेयक को बाद में सदन ने मंजूरी दे दी. संशोधित वित्त विधेयक पर शुक्रवार को राज्यसभा में विचार किया जाएगा. संशोधनों पर टिप्पणी करते हुए, नांगिया ग्लोबल एडवाइजर्स के कर भागीदार (विलय एवं अधिग्रहण) संदीप झुनझुनवाला ने कहा कि व्यक्तिगत शेयरधारकों के लिए पुनर्खरीद से प्राप्त पूंजीगत लाभ पर 12 प्रतिशत का एकसमान अधिभार लगाने से उनकी प्रभावी कर लागत में काफी वृद्धि होगी, क्योंकि पहले कम अधिभार लागू था.
वर्तमान में, 50 लाख रुपये तक की कर योग्य आय पर कोई अधिभार नहीं लगाया जाता है, जबकि 50 लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के बीच की कर योग्य आय पर पुनर्खरीद (बायबैक) से प्राप्त पूंजीगत लाभ पर 10 प्रतिशत का अधिभार लगता है.
झुनझुनवाला ने कहा, ‘‘एकसमान 12 प्रतिशत अधिभार लगाने से इन सभी श्रेणियों में कर का भुगतान बढ़ जाएगा, जिससे लाभांश जैसे विकल्पों की तुलना में पुनर्खरीद नकदी जुटाने का एक महंगा तरीका बन जाएगा. इससे व्यक्तिगत शेयरधारकों की पुनर्खरीद में रुचि कम होने की संभावना है और पूंजी आवंटन संबंधी निर्णय प्रभावित हो सकते हैं.’’
उन्होंने कहा कि इस संशोधन का प्रभाव मुख्य रूप से छोटी और मध्यम आकार की पुनर्खरीद तक ही सीमित रहेगा. झुनझुनवाला ने कहा कि बड़ी यानी एक करोड़ रुपये से अधिक की पुनर्खरीद पर पहले से ही 15 प्रतिशत का उच्च अधिभार लागू होता है. ऐसे में ‘‘यह संशोधन वास्तव में इस श्रेणी के लिए अधिभार में तीन प्रतिशत की कमी का संकेत देता है.’’
कॉरपोरेट शेयरधारकों के लिए, पुनर्खरीद पर एकसमान 12 प्रतिशत अधिभार उन स्थितियों में प्रभाव डाल सकता है जहां कर योग्य आय एक करोड़ रुपये तक है, जहां पहले कोई अधिभार लागू नहीं होता था.
जहां कर योग्य आय एक करोड़ रुपये और 10 करोड़ रुपये के बीच है, वहां सात प्रतिशत अधिभार लागू होता है.
झुनझुनवाला ने कहा, ‘‘दोनों परिस्थितियों में एकसमान 12 प्रतिशत अधिभार लागू होने से कुल कर भार बढ़ेगा. इससे पुनर्खरीद अपेक्षाकृत अधिक महंगी हो जाएगी.’’
वित्त विधेयक में शामिल संशोधनों में एक पूर्व की तिथि से संशोधन भी शामिल है. इसमें उन परिस्थितियों का उल्लेख है जिनमें आयकर प्राधिकरण द्वारा दी गई स्वीकृतियों को अमान्य नहीं माना जाएगा.
इसका विश्लेषण करते हुए झुनझुनवाला ने कहा कि यह संशोधन स्पष्ट करता है कि आकलन, पुनर्मूल्यांकन या पुनर्गणना प्रक्रियाओं में इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी गई स्वीकृतियों को अपर्याप्त तर्क, प्रमाणीकरण दोष या डिजिटल हस्ताक्षर की अनुपस्थिति के कारण अमान्य नहीं किया जा सकता है. यह पिछली तिथि एक अप्रैल, 2021 से लागू होगा.
उन्होंने कहा कि यह एक उपचारात्मक और सत्यापन प्रावधान जान पड़ता है जिसका उद्देश्य पहले इलेक्ट्रॉनिक रूप से जारी किए गए दस्तावेजों की वैधता को बनाये रखना है.
झुनझुनवाला ने कहा, ‘‘यह लंबित विवादों में करदाताओं की स्थिति को समाप्त कर सकता है और उन मामलों को पुनर्जीवित कर सकता है जो अन्यथा प्रक्रियात्मक खामियों के कारण रद्द हो सकते थे.’’
यह संशोधन वित्त विधेयक 2026 में डीआईएन से संबंधित पहले के प्रस्ताव के बाद आया है, जिसे पिछली तिथि से प्रभावी करने का प्रस्ताव है. एक अक्टूबर, 2019 से लागू हुए इस संशोधन का उद्देश्य केवल डीआईएन न देने के कारण आकलन रद्द होने से रोकना था.
झुनझुनवाला ने कहा, ‘‘ये संशोधन नीतिगत बदलाव को दर्शाते हैं. इससे यह सुनिश्चित होता है कि सत्यापन संबंधी समस्याओं या डिजिटल हस्ताक्षर की अनुपस्थिति जैसी कमियों के कारण कार्यवाही अमान्य न हो.’’


