मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केंद्रीय निदेशक मंडल ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को ₹2,86,588.46 करोड़ (लगभग ₹2.87 लाख करोड़) के अधिशेष (सरप्लस) हस्तांतरण को मंजूरी दे दी है. केंद्रीय बैंक के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा लाभांश (डिविडेंड) भुगतान है. यह निर्णय मुंबई में आयोजित केंद्रीय निदेशक मंडल की 623वीं बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने की.
यह ऐतिहासिक वित्तीय हस्तांतरण ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से पश्चिम एशिया के संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह मेगा पेआउट केंद्र सरकार के लिए एक मजबूत राजकोषीय सहारा साबित होगा, जिससे बजटीय प्रबंधन और ईंधन-उर्वरक सब्सिडी के बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.
आय में 26.42% की शानदार वृद्धि
आरबीआई द्वारा जारी वित्तीय विवरण के अनुसार, मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा परिचालन, विदेशी परिसंपत्तियों पर मिले ऊंचे रिटर्न और कुशल ट्रेजरी प्रबंधन के कारण बैंक की कमाई में जबरदस्त उछाल आया है. वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान केंद्रीय बैंक की सकल आय में 26.42 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वहीं, जोखिम प्रावधानों से पहले बैंक के खर्चों में भी 27.60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
जोखिम प्रावधानों और वैधानिक फंडों में ट्रांसफर से पहले आरबीआई की शुद्ध आय वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर ₹3,95,972.10 करोड़ हो गई, जो पिछले वित्त वर्ष (FY25) में ₹3,13,455.77 करोड़ थी.
बैलेंस शीट का आकार ₹91.97 लाख करोड़ के पार
देश के केंद्रीय बैंक की वित्तीय स्थिति पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हुई है. 31 मार्च, 2026 तक आरबीआई की बैलेंस शीट का कुल आकार 20.61 प्रतिशत के विस्तार के साथ ₹91,97,121.08 करोड़ पर पहुंच गया है.
वैश्विक वित्तीय बाजार की अस्थिरता और किसी भी संभावित आर्थिक झटके से निपटने के लिए बैंक ने अपनी सुरक्षा प्रणाली को और मजबूत किया है. आरबीआई ने आर्थिक पूंजी ढांचे (ECF) के तहत अपने आकस्मिक जोखिम बफर को 6.5 प्रतिशत के ऊपरी स्तर पर बनाए रखने का फैसला किया है. इसके तहत इस वर्ष ₹1,09,379.64 करोड़ की भारी राशि जोखिम बफर में ट्रांसफर की गई है, जो पिछले वित्त वर्ष में ₹44,861.70 करोड़ थी.
राजकोषीय घाटे पर सकारात्मक प्रभाव
इस अधिशेष राशि के हस्तांतरण से सरकार को चालू वित्त वर्ष के लिए अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी मदद मिलेगी. इसके साथ ही सरकार के पास बुनियादी ढांचे के विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ाने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध होंगे.


