आने वाले दिनों में अडानी समूह की कंपनियों के शेयर निवेशकों के फोकस में रहने की संभावना है. इसकी वजह यह है कि अमेरिका के सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ दायर सिविल फ्रॉड मामले को आगे बढ़ाने की पूरी कानूनी प्रक्रिया तय कर ली है.
नोटिस स्वीकार, अदालत को नहीं करना होगा फैसला
न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित संघीय अदालत में शुक्रवार को दाखिल एक याचिका में बताया गया कि गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी की ओर से केस लड़ रहे अमेरिकी वकीलों ने SEC के कानूनी दस्तावेज स्वीकार करने पर सहमति दे दी है. इससे अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गारौफिस को यह तय करने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि प्रतिवादियों को नोटिस किस माध्यम से भेजा जाए. यह कदम एक मानक कानूनी प्रक्रिया माना जा रहा है, जिससे मामला औपचारिक रूप से आगे बढ़ सकेगा.
90 दिनों में देना होगा जवाब
यह नोटिस सिविल फ्रॉड के उस मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि निवेशकों को कथित रिश्वत योजना को लेकर गुमराह किया गया. यदि अदालत इस समझौते को मंजूरी देती है, तो गौतम और सागर अडानी के पास 90 दिन का समय होगा, जिसमें वे SEC की शिकायत का जवाब दे सकते हैं या मुकदमा खारिज करने की अर्जी दाखिल कर सकते हैं.
इसके बाद SEC को तय समय के भीतर अपनी आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलेगा और फिर प्रतिवादी पक्ष को जवाब देने का अधिकार होगा.
वकीलों ने टिप्पणी से किया इनकार
इस मामले में गौतम अडानी की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील रॉबर्ट गिउफ्रा और सागर अडानी के वकील सीन हेकर ने फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर किसी भी तरह की सार्वजनिक टिप्पणी करने से इनकार किया है.
कौन हैं रॉबर्ट गिउफ्रा
रॉबर्ट गिउफ्रा अमेरिका के जाने-माने वकीलों में गिने जाते हैं. वे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़े एक आपराधिक मामले में भी कानूनी पैरवी कर रहे हैं. इसके अलावा वे वोल्क्सवैगन और *गोल्डमैन सैक्स जैसे बड़े कॉरपोरेट मामलों में भी सफलतापूर्वक दलीलें रख चुके हैं. उन्हें वर्ष 2025 में ‘सिक्योरिटीज लिटिगेटर ऑफ द ईयर’ का सम्मान भी मिल चुका है.
क्या है पूरा मामला
SEC ने नवंबर 2024 में गौतम अडानी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था. नियामक का आरोप है कि अडानी ने भारत में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं हासिल करने के उद्देश्य से पहले अमेरिकी निवेशकों और बैंकों से धन जुटाया और बाद में उसी धन से सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की कथित योजना बनाई.
SEC के अनुसार यह राशि करीब 25 करोड़ डॉलर (लगभग 2,000 करोड़ रुपये) के आसपास बताई गई है. अडानी पक्ष पर अमेरिकी प्रतिभूति कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है.
नोटिस देने में आई थी दिक्कत
SEC का कहना था कि अडानी भारत में रहने के कारण उन्हें कानूनी नोटिस तामिल कराना मुश्किल हो रहा था. इसी वजह से हाल ही में SEC ने अदालत से अनुरोध किया था कि ईमेल या अन्य कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से नोटिस भेजने की अनुमति दी जाए.
निवेशकों की नजरें शेयरों पर
कानूनी प्रक्रिया के इस नए घटनाक्रम के बाद माना जा रहा है कि अडानी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में हलचल बनी रह सकती है. निवेशक अब अदालत के अगले फैसले और अडानी पक्ष की कानूनी रणनीति पर नजर लगाए हुए हैं.


