नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की महत्वपूर्ण बैठक अगले सप्ताह आयोजित होने जा रही है. वैश्विक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच, आर्थिक विशेषज्ञों और बाजार विश्लेषकों ने इस बैठक के नतीजों को लेकर अपने पूर्वानुमान साझा किए हैं. अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार केंद्रीय बैंक रेपो रेट और अपने नीतिगत रुख में कोई बदलाव नहीं करेगा.
प्रमुख बिंदु: यथास्थिति रहने के कारण
1. भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल का दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में ‘ऊर्जा का झटका’ पैदा किया है. मार्च के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही हैं. ऐसी अस्थिर स्थिति में, आरबीआई जल्दबाजी में दरों में बदलाव करने के बजाय ‘रुको और देखो’ की नीति अपना सकता है.
2. महंगाई और विकास दर का अनुमान
बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि इस बैठक में मुख्य ध्यान दरों पर नहीं, बल्कि आरबीआई द्वारा जारी किए जाने वाले जीडीपी (GDP) और महंगाई के अनुमानों पर होगा. बाजार यह समझने की कोशिश करेगा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के बीच केंद्रीय बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर कितना आश्वस्त है.
3. ब्याज दर कटौती के चक्र का अंत
एचएसबीसी (HSBC) ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था अब ब्याज दरों में कटौती के चक्र के अंत तक पहुंच गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई अब एक ‘लंबे ठहराव’ की स्थिति में रह सकता है. हालांकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन आरबीआई का ध्यान तात्कालिक महंगाई के बजाय अगले एक साल के महंगाई परिदृश्य पर अधिक होगा.
भविष्य की चुनौतियां: क्या बढ़ सकती हैं दरें?
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यदि महंगाई दर आरबीआई की ऊपरी सहनशीलता सीमा 6 प्रतिशत को पार करती है, तो वर्ष के अंत तक रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है. अगले 3-4 महीनों में युद्ध और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने वाला प्रभाव अधिक स्पष्ट होगा, जिसके बाद ही आरबीआई अपने कड़े रुख पर विचार करेगा.
6 से 8 अप्रैल तक चलने वाली इस तीन दिवसीय बैठक में तरलता प्रबंधन और रुपये की विनिमय दर को स्थिर रखने पर जोर दिए जाने की उम्मीद है. फिलहाल, कर्जदारों के लिए राहत की बात यह है कि उनकी ईएमआई (EMI) में तत्काल किसी बढ़ोतरी के संकेत नहीं मिल रहे हैं.


